Home आध्यात्म कांवड़ यात्रा

कांवड़ यात्रा

0 second read
0
0
140
kanvar, kanvad

प्रत्येक वर्ष सावन के महीने मे कांवड़ यात्रा प्रारम्भ होती है , भगवान शिव से अपना मनवांछित फल प्राप्त करने के लिए भक्तगण सावन के महीने मे हरिद्वार, गौमुख, हृषिकेश आदि स्थानों से गंगा जल  से भरी कांवड़ को अपने कंधे पर लेकर चलते हैं और श्रावण माह की चतुर्दशी जिसे शिवरात्रि के नाम से भी जाना जाता है के दिन अपने घर या अपने गांव के निकट वाले शिव मंदिर में जाकर उस गंगा जल से भगवान शिव का अभिषेक करते हैं| श्रावण का महीना आते ही शिवालयों मे भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है|

कांवड़ यात्रा की शुरवात कैसे हुई ?

पहली कथा – इस कथा के अनुसार जब देवताओ और असुरो ने समुन्द्र मंथन किया था तो तब समुन्द्र से भयावह विष भी निकला था , उस विष को पीने के लिए जब कोई भी देवता और असुर आगे नहीं आया तो भगवान शिव ने उस भयावह विष का सेवन किया और सृष्टि की रक्षा की, उस विष को पीने के बाद भगवान शिव के कंठ में अत्यधिक जलन उत्पन हुई  तो उसको शांत करने के लिए सभी देवताओं ने भगवान शिव के ऊपर जल डालकर उसको शांत किया, कहते हैं की तभी से शिवलिंग के ऊपर जल चढाने की शुरुवात हुई|

दूसरी कथा – दूसरी कथा के अनुसार भगवान परशुराम शिवजी के बहुत बड़े उपासक हैं , भगवान शिव की उपासना करने के लिए परशुराम जी भगवान शिव का मंदिर बनवाते हैं और कांवड़ मे जल लाकर उनका अभिषेक करते हैं, उसी दिन से कांवड़ यात्रा के शुरवात मानी जाती हैं|

इस यात्रा में भक्तगण अपने आराध्य भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए सेंकडो किलोमीटर की यात्रा नंगे पैर चलकर ही पूरा करते हैं, यह यात्रा बहुत ही कठिन होती हैं और इस यात्रा को पूरा करने में पैरों में छाले और घाव हो जाते हैं , यह यात्रा बहुत ही कठिन होती हैं परन्तु भक्तगण हर हर महादेव और बम बम भोले का उद्घोष करते हुए इस यात्रा को पूरी श्रद्धा के साथ पूरा कर लेते हैं|

शिव पुराण के अनुसार कंधे पर कांवड़ रखकर बोल बम और हर हर महादेव का उद्घोष करते हुए चलने पर बहुत बड़े पुण्य की प्राप्ति होती है|

कांवड़ यात्रा के नियम –

इस यात्रा के नियम काफी सख्त होते हैं

  • इस यात्रा को पूरा करने के लिए किसी भी प्रकार के नशे शराब आदि की मनाही होती हैं|
  • कांवड़ यात्रा के समय मांशाहारी भोजन की पूर्ण रूप से मनाही होती हैं |
  • इस यात्रा के दौरान कांवड़ को जमीन पर नहीं रख सकते हैं यदि कहीं रुकना होता हैं तो कांवड़ को पेड या ऊँचे स्थान पर रखना होता हैं |
  • कांवड़ यात्रा करते समय चमड़े से बने वस्त्र और वस्तुए नहीं पहननी चाहिए |

आधुनिक समय में कांवड़ के प्रकार –

  • खड़ी कांवड़
  • झूला कांवड़
  • डांक कांवड़
  • झांकी वाली कांवड़
  • साइकिल अथवा मोटर साइकिल वाली कांवड़

हिन्दू धर्म में  भगवान शिव को सच्ची श्रद्धा के साथ बहुत कम समय में ही प्रसन्न किया जा सकता है  और ये अपने भक्तों पर कृपा बरसा देते हैं और जिसके कारण इनको भोलेनाथ के नाम से भी पुकारा जाता है इनको प्रसन्न करने के लिए भक्तगण फाल्गुन मास और श्रावण  मास दोनों ही महीनो मे कांवड़ लेकर आते हैं, और जिसके कारण शिवभक्तों के बिगड़े हुए काम और मनोकामनाएं पूरी होती हैं

Load More Related Articles
  • ground water level

    घटता भूजल स्तर

    जल ही जीवन है और इसके  बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना  भी नहीं की जा सकती, परन्तु हम लोगों …
  • Maharana Pratap

    महाराणा प्रताप

    मेवाड़ के राजा, महाराणा प्रताप अपने समय एक मात्र ऐसे स्वाभिमानी शासक थे, जिन्होंने देश की स…
  • Raksha Bandhan, Rakhi ka Tyohar

    रक्षाबंधन का त्यौहार

    भारतीय धर्म अनुसार भाई बहन का रिश्ता बहुत ही पवित्र रिश्ता माना जाता है | हिंदू धर्म में भ…
Load More By RPS
Load More In आध्यात्म

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also

घटता भूजल स्तर

जल ही जीवन है और इसके  बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना  भी नहीं की जा सकती, परन्तु हम लोगों …