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जानिए क्या रहा चीफ जस्टिस महाभियोग मामला

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chief justice mahabhiyog mamla

12 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट के चार मौजूद वरिष्ठतम न्यायाधीशों ने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर देश की न्यायपालिका और राजनीति गलियारों में भूचाल ला दिया। जस्टिस चेलमेश्वर, जस्टिस गोगोई, जस्टिस लाकुर और जस्टिस जोसेफ ने सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली पर ही सवाल खड़े कर दिए। प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए उनके बयान ने देश के अंदर एक नई बहस छेड़ दी। लोगों के बीच चर्चा का विषय बना ये मुद्दा केवल मुद्दा ना रहकर राजनैतिक भी हो गया। विपक्षी पार्टियों ने इसे ऐसे भुनाने की कोशिश की, जैसे उन्हें साल 2019 की जीत के लिए बड़ा कारण मिल गया हो। लेकिन दुख की बात तो ये रही कि मुद्दे को राजनैतिक रुप से जितना तूल दिया गया, उतनी ही नाटकीय तरीके से ये औंधे मुंह गिरी। जी हां, सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का मामला पिछले कुछ महीनों में ऐसे- ऐसे दौर से गुजरा, जिससे ये साफ नजर आया कि ये मामला संवैधानिक ना होकर राजनैतिक बन गया हो। आइए जरा विस्तार से जानते हैं चीफ जस्टिस महाभियोग मामले में कब- कब और क्या- क्या हुआ।

12 जनवरी 2018-  सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जज जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ़ ने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। जिनमें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा पर कई आरोप लगाए। इन जजों ने सुप्रीम कोर्ट में केस अलॉट किए जाने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए और सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली में चल रही अनियमितताओं का जिक्र किया।

12 अप्रैल 2018- कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में जो हो रहा है, उससे हम बहुत चिंतित हैं। भारत के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के विकल्प अब भी हमारे पास मौजूद है।

19 अप्रैल 2018– कांग्रेस ने इस दिन को भारत के इतिहास का ‘सबसे दुखद दिन’ बताया।  इस दिन सीबीआई के विशेष न्यायाधीश एच.बी. लोया की रहस्यमय हालात में मौत की जांच एसआईटी से कराने की मांग वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज कर दिया गया था।

20 अप्रैल 2018– कई दिनों से विपक्षी पार्टियों के बीच चल रही सुगबुगाहट इस दिन साफ हो गई। कांग्रेस के नेतृत्व में 7 विपक्षी दलों ने राज्यसभा सभापति और उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू से मुलाकात की और प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा को पद से हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव सौंपा। मुलाकात से पहले हुई विपक्षी दलों की बैठक में कांग्रेस के अलावा समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और एनसीपी के नेताओं ने भाग लिया। राज्यसभा के 71 सदस्यों ने इस महाभियोग में हस्ताक्षर किए, लेकिन इनमें से 7 रिटायर सदस्य थे, इसलिए उनके हस्ताक्षर की गिनती नहीं हुई। विपक्षी दलों ने महाभियोग के लिए विपक्ष ने चीफ जस्टिस पर पांच गंभीर आरोप लगाए।

  • प्रसाद ऐजुकेशन ट्रस्ट में लाभ लेने का आरोप
  • सीबीआई के पास सबूत होने के बावजूद चीफ जस्टिस ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज के खिलाफ एक मामले में केस दर्ज करने की मंजूरी नहीं दी
  • एक मामले में तारीख बदलने का आरोप
  • वकील रहते झूठा हलफनामा दिया
  • संवेदनशील मामलों को चुनिंदा जजों के पास भेजा

23 अप्रैल 2018– राज्यसभा के सभापति एम. वेंकैया नायडू ने मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ विपक्षी दलों के महाभियोग नोटिस को खारिज कर दिया। सभापति ने फैसले को ‘जल्दबाजी में लिया गया फैसला’ और अवैध व असंवैधानिक बताया।

23 अप्रैल 2018– विपक्षी दलों ने पूरे मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाने का ऐलान किया। सीजीआई दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को सभापति के द्वारा खारिज किए जाने के मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाने का फैसला करते हुए कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने कहा, ‘सभापति का फैसला अभूतपूर्व, अवैध, गलत और असंवैधानिक है।

7 मई 2018– राज्यसभा के दो सदस्य प्रताप सिंह बाजवा और अमी हर्षदराय याज्ञनिक ने इस दिन सुप्रीम कोर्ट में राज्यसभा के सभापति नायडू द्वारा महाभियोग नोटिस को खारिज किए जाने को चुनौती दी।

7 मई 2018– चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने देर शाम पीठ और उसके पांच जजों का चयन कर लिया। संविधान पीठ में जस्टिस एके सीकरी, जस्टिस एसए बोबड़े, जस्टिस एमवी रमना, जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस आदर्श कुमार गोयल शामिल थे। इनमें में वो चार वरिष्ठ जज शामिल नहीं थे, जिन्होंने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा पर अधिकारों के दुरुपयोग का आरोप लगाया था।

8 मई 2018– इस दिन सुप्रीम कोर्ट में हाई वोल्टेज ड्रामा देखने को मिला। कांग्रेस नेता और याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश किए गए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्‍बल ने सुनवाई के लिए पांच न्यायाधीशों की पीठ गठित किए जाने पर सवाल उठाया। उन्‍होंने पीठ गठन को ही कोर्ट में चुनौती देने की मांग की। जब मामले की सुनवाई कर रही पांच न्‍यायाधीशों की संविधान पीठ सिब्‍बल की मांग पर राजी नहीं हुई, तो सिब्‍बल ने याचिका वापस ले ली।

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