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ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं?

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God is existing or not

यकीन मानिए ये दुनिया के कुछ सबसे विवादित सवालों में से एक है। पृथ्वी का हर एक इंसान इस सवाल को अपने जीवन काल में कभी ना कभी अपने आप से करता जरूर है। ईश्वर है या नहीं, अगर है तो कहां है? ईश्वर का काम क्या है? ईश्वर को जन्म देने वाला कौन है? ईश्वर एक है या अनेक? इन सभी सवालों का जवाब हम अपनी समझ से देने की पूरी कोशिश करेंगे। हो सकता है आपको हमारी बातें पसंद ना आए मगर हम किसी की भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचाना चाहते।

ईश्वर है या नहीं?

ईश्वर का होना ना होना आप पर निर्भर करता है। जी हाँ, ईश्वर का अस्तित्व इंसान से है। अगर इंसान नहीं चाहता कि कोई ईश्वर हो तो कोई ईश्वर नहीं है। सुनने में आपको बुरा लग सकता है लेकिन ऐसी कोई इश्वरी ताकत नहीं है जो इस दुनिया में अच्छे –बुरे का हिसाब रखती है। ईश्वर महज एक भ्रम है जो इतना प्रबल हो चुका है कि हम उसे सच मानने लगे हैं। ईश्वर केवल एक मिथ्या है जो कई शताब्दियों पहले पृथ्वी पर एक सोच के जरिए फली-फूली। सीधे व आसान शब्दों में कहा जाए तो ईश्वर एक दिमाग की उपज है।

क्या पवित्र पुस्तकें झूठी हैं?

इसका जवाब आप जानतें हैं। पवित्र पुस्तकें मानव के मार्गदर्शन के लिए लिखी गईं थीं। इन पुस्तकों में बेहतर जीवन जीने के तरीके बताए गए हैं। ये पुस्तकें इसांन को सही गलत में फर्क बताती हैं। मगर इन पुस्तकों को किसी ईश्वर ने नहीं लिखा। ये मानव की बेहतरीन रचनाओं के सिवा और कुछ नहीं हैं। इनमें जिस ईश्वर की बात करी गई है वे महज एक कल्पना है। उसका जन्म सिर्फ़ इसांन का सहारा बनने के लिए किया गया था। अकेले होते हुए भी किसी अदृश्य ताकत का साथ होने से मानव अपने आप को सुरक्षित समझता है। कुछ बुरा करने से रोकने के लिए ईश्वर का हर जगह होने का विचार रखा गया। आप के बुरे कार्य में भले ही आपको कोई ना देखे मगर ईश्वर सबको देखता है, इस बात से बहुत लोग गलतियॉ करने से बच जाते हैं। ईश्वर एक काल्पनिक सहारे जैसा है जो हर एक इसांन की मदद करता है।

ishwar ka astitva hai ya nahi

ईश्वर के जन्म के सबूत हैं।

कई पवित्र पुस्तकें इस बात का दावा करतीं है कि ईश्वर ने जन्म लिया है। ये किताबें काफी लम्बें समय तक ये भ्रम बनाए रखने में सफल भी रहीं। हम हर एक किताब का उदाहरण तो यहां नहीं दे सकते लेकिन हम वेदों के जरिए इस बात को बेहतर समझ सकतें है। इसमें तो कोई विवाद नहीं है कि वेद दुनिया के सबसे पुराने लिखित दस्तावेज़ हैं। वेदों कि रचना तकरीबन आज से 3500 वर्ष पहले शुरू हुई थी और लगभग 1500 वर्षों तक चली। वेदों में ईश्वर का सबसे पुरातन उल्लेख मिलता है। लेकिन वेदों को लिखने वाले भी मानव ही थे। वेदों की सत्यता पर कोई आंच ना आ सके इस बात को ध्यान रखते हुए वेदों को लिखने वालों ने उन्हें अपौरुषेय कहा जिसका अर्थ होता है दैविक। इस शब्द ने एक नई कल्पना को जन्म दिया जिससे आज हार इसांन वाकिफ़ है।

क्या वेदों में ईश्वर का जिक्र उसके अस्तित्व का सबूत नहीं है?

नहीं कतई नहीं। वेदों में ईश्वर का जिक्र उसके अस्तित्व का सबूत नहीं है। सबसे पुरातन वेद ॠग्वेद में ईश्वर का या यूं कहा जाए के आज के ईश्वर जिसे हम जानते हैं उसका कोई जिक्र नहीं है। ॠग्वेद में देवताओं का जिक्र मिलता है और उसमें सबसे पूजनीय व प्रमुख देवता ‘इन्द्र’ है। लेकिन समय के साथ-साथ इसांन हमेशा ज्यादा बलवान की तलाश करता है। इसी तलाश ने ईश्वर को जन्म दिया। इन्द्र अब इतना खास नहीं रह गया था। बार-बार उसके जिक्र ने उसे आम बना दिया था। तब जरूरत महसूस हुए ज्यादा बड़े और ज्यादा ताकतवर देवता की। इस तरह ईश्वर का जन्म हुआ। ईश्वर को इतना बलवान बताया गया कि वह दुनिया का रचियता है और उसी के इच्छा से सब हो रहा है।

वेदों के अलावा भी तो पुस्तकें हैं, क्या वो भी झूठी हैं?

हां, अगर आप सच सुनना चाहतें है तो यह बात सच है। वे किताबें बस एक मार्गदर्शक हैं। समय के साथ-साथ उनमें लिखी बातें धुंधली पड़ती जाती हैं। उन बातों को कभी भी शत प्रतिशत लागू नहीं किया जा सकता। लेकिन उन किताबों का निचोड़ हमें अच्छाई सिखाता है। जो पृथ्वी पर शांतपूर्ण जीवन के लिए बेहद जरूरी है। ईश्वरहीनता कमजोर व्यक्तियों के लिए घातक हो सकती है। लेकिन मानव के अंदर की अच्छाई ही ईश्वर है। मानव स्वयं ईश्वर है। वही ईश्वर का निर्माता है। ईश्वर महज एक कल्पना है। समय के साथ बदलाव जरूरी है। हमारी तरफ से आज के लिए बस इतना ही।

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