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हिन्दू धर्म या वैदिक धर्म या सनातन धर्म

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“हिन्दू धर्म” यह शब्द कोई नया नहीं है। दुनिया में इस धर्म को मानने वाले लोग भारत में सबसे ज्यादा है और शायद इसलिये इस धर्म को भारत का धर्म भी कहा जाता है। मगर इस धर्म कि नींव केवल भारत में ही नहीं थी या यूं कहा जाए कि इसकी शाखाएं भी भारत की तरह ही कई देशों में फैली हुईं हैं। आज हम इसी धर्म पर प्रकाश डालेंगे ।

धर्म कि नींव

विश्व कि उत्पत्ति के बाद जब मानव में चेतना आई तब वह स्वयं व अपने आसपास के वातावरण से सचेत होने लगा। जब इंसान गांव और शहरों में रहने लगा तो कई सभ्यताओं ने जन्म लिया। उन सभ्यताओं ने समाज को बेहतर तरीके से आगे बढाने के लिए कुछ विशेष गुणों और नियमों का पालन करना शुरू किया। जो धीरे-धीरे समय की धारा और बदलती मानसिकता की जटिलताओं से प्रभावित होकर एक नए रूप में प्रकट होता। उसी जटिल रूप को धर्म कहा जाता है।

हिन्दू धर्म की प्राचीनता

हिन्दू धर्म उन प्राचीनतम धर्मों में से है जो मानव ने सबसे पहले स्वीकार किया। यहां पर यह कहना भी गलत ना होगा कि यह हिन्दू धर्म दुनिया का सबसे प्राचीन धर्म है। इसको सनातन व वैदिक धर्म भी कहा जाता है। इसमें कोई विवाद नहीं कि वेद इतिहास के सबसे पुराने लिखित साक्ष्य है। वेदों को लिखने वाले वह उनमें उल्लेखित ज्ञान का पालन करने वालों को सनातनी कहा जाता है। इन्हीं लोगो को आधुनिक भाषा में हिन्दू धर्म के अनुयायी कहा जाता है। इसको केवल धर्म कहना भी गलत होगा क्योंकि यह एक संस्कृति है। आर्यों के काल से यह चली आ रही है। इस संस्कृति के मूल तत्व सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा, दान आदि है। देखा जाए तो यह विश्व के सभी दूसरे धर्मों का जनक है।

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हिन्दू धर्म और मूर्तिपूजन

वैदिक काल में मूर्तिपूजन नहीं था। लोग यज्ञ किया करते थे और देवी-देवताओं से अच्छे जीवन की कामना किया करते थे। ॠग्वेद के काल में इन्द्र सबसे ज्यादा पुजे जाना वाला देवता था। क्योंकि इन्द्र वर्षा से जुड़ा हुआ था तो इसका महत्व ज्यादा था। लेकिन कालांतर में त्रिशक्ति का उदय हुआ। ब्रह्मा, विष्णु और महेश जो देवताओं के भी उर्जा स्त्रोत मानें जाते हैं अस्तित्व में आए। अब वैदिक सभ्यता इतनी सरल नहीं रह गई थी। लोग भक्ति और ज्ञान की तलाश में निकलने लगे। लोग अपने-अपने तरीके से ईश्वर को प्राप्त करने के रास्ते ढूंढने लगे। भक्ति के सागर में डूबने के लिए एकाग्रता कि जरूरत होती है जिसमें मूर्तियों ने अहम योगदान दिया। मूर्तियों के जरिए भक्त ईश्वर से आध्यात्मिक रूप से जुड़ जाता है। और मूर्तियां ईश्वर का स्वरूप बन गईं।

हिन्दू धर्म कि शिक्षाएं

यहां पर ये कहना गलत होगा कि हिन्दू धर्म की शिक्षाएं दूसरे धर्म से पूर्णतया भिन्न है। जैसेकि हम पहले भी बता चुके हैं कि यह धर्म एक संस्कृति है। इसकी शिक्षाएं जीवन को शाश्वत तरीक़े से जीने के लिए प्रेरित करती हैं। समय-समय पर लगों ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्ध करने के लिए नए-नए धर्मों को जन्म दिया। लेकिन सभी धर्मों की मूलशिक्षाएं एक ही हैं- सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा, और ज्ञान। यही शिक्षाएं हिन्दू धर्म की भी है। आज के लिए हमारी तरफ़ से बस इतना ही।

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