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ईच्छामृत्यु या दयामृत्यु (Euthanasia)

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ईच्छामृत्यु , दयामृत्यु , Euthanasia

क्या होती है इच्छा मृत्यु  ?

जिस भारतीय संस्कृति और धर्मों में जीवन रक्षा का संदेश दिया गया है  उसी भारत के सर्वोच्य न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की नेतृत्ववाली 5 न्यायधीशों की बेंच ने कुछ शर्तों के साथ निष्क्रिय ईच्छामृत्यु” एवं “लिविंग विल “ को अनुमति प्रदान किया। न्यायालय ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि जो व्यक्ति कभी न ठीक होनेवाली बिमारी से ग्रसित या घोर पीड़ादायक जीवन जी रहा हो, उसे अपनी जीवन लीला को सम्मान के साथ खत्म करने का अधिकार होगा।

ईच्छामृत्यु या दयामृत्यु को भारत में असंवैधानिक अपराध माना जाता था चाहे पीड़ित व्यक्ति गंभीर असहनीय पीड़ा से गुजर रहा हो या मानवीय भावना से प्रेरित हीं क्यों न हो इसे भारतीय दंड संहिता की धाराओं के अंतर्गत एक अपराध के श्रेणी में रखा जाता था।

जीने का हक है तो मरने का भी हक होना चाहिए। यह मुद्दा बहुत ही जटिल और बहस का विषय बन चुका है।

ईच्छामृत्यु जैसे विषय पर पूरे विश्व में एक प्रकार से बहस का मुद्दा बन गया है। इस विषय से कानुनी हीं नहीं वल्कि सामाजिक और मेडिकल पक्ष भी जुड़ हुआ है। पूरे विश्व में ईच्छामृत्यु की अनुमति देने की मांग बहुत तेजी से बढ़ी है। रोगी की मृत्यु के लिए जीवन रक्षक उपकरणों को हटाने का तरीका पूरे विश्व में वैध माना जा रहा है।

अमेरिका की एक 41 वर्षीय महिला टेरी शियावो को आज से 28 पहले दिल का दौरा पड़ा था। इसका ब्रेन काम करना बंद कर दिया था इसलिए टेरी के पति की ईच्छा थी कि टेरी कष्टदायी जिंदगी से निजात पाने के लिए मौत की नींद सो जाये। लेकिन टेरी के माता-पिता को यह मंजुर नहीं था। उनकी इच्छा थी कि उनकी बेटी जिंदा रहे। अंततः सात वर्ष की कानुनी लड़ाई के बाद टेरी के पति को उसकी आहार नली को हटाने की इजाजत मिल गयी।

टेरी के इस मामले पर हुई बहस का असर भारत में भी होने लगा और भारत में भी ईच्छामृत्यु की मांग जोर-शोर से उठने लगा। जिसमें एक मामला काफी दिनों तक चर्चा में रहा, हैदराबाद का एक 25 साल का युवक जो अपने मृत्युपूर्व अंग दान करने की इच्छा प्रकट की थी जिसे अदालत से अनुमती नहीं मिल सकी थी। इसके अलावा देशभर के विभिन्न शहरों से भारतीय राष्ट्रपति और राज्यों के राज्यपाल के पास दया याचिकाएं आने लगी। लेकिन भारत में इस प्रकार की कोई कानून नहीं होने की वजह से किसी को अनुमति नहीं मिल सकी थी।

गलत इस्तेमाल होने की आशंका

यहां ध्यान देनेवाली बात यह है कि सर्वोच्य न्यायालय से अनुमति मिलने के बाद भारत जैसे देश में एक आशंका बनी रहेगी क्योंकि यहां कानुन की आड़ में किडनी ट्रांसप्लांट को लेकर किडनी को बेचने का अवैध धंधा होता रहा है, इसलिए भारतीय जनमानस पर  “मृत्यु के अधिकार” का भी गलत इस्तेमाल होने की आशंका बनी रह सकती है।

 

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